रंगों में रमा उत्तर प्रदेश : फागुन का फुहारमय उत्सव

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प्रणय विक्रम सिंह

@SamacharBhaarti

फागुन जब गंगा के घाटों पर गुलाल-सी गुंजन बिखेरता है, जब सरयू की सलिल-धारा में स्नेह का रंग घुल जाता है, जब यमुना की लहरों पर राधा-कृष्ण की रास रंग बनकर थिरकती है तब उत्तर प्रदेश केवल प्रदेश नहीं रहता, वह स्वयं एक जीवंत रंगोत्सव बन उठता है।

यहां हवा भी अबीर ओढ़ लेती है, धूप भी केसरिया हो जाती है और मन भी मधुमास की मादकता में भीग जाता है।

ब्रज की बांसुरी में बसंत की बयार है, बरसाने की गलियों में लट्ठमार की लाज-भरी लय है। वृंदावन में उड़ता गुलाल मानो गोपियों की हंसी हो, और मथुरा की चौक में गूंजता ‘राधे-राधे’ स्वयं रंगों का राग बन जाता है। यहां रंग केवल चेहरे पर नहीं लगते, यहां रंग आत्मा को आलिंगन करते हैं।

अयोध्या में रामनाम की रश्मियां अबीर बनकर उड़ती हैं। काशी में हर घाट रंगों की आरती उतारता है। गंगा की धारा में भी जैसे गुलाल घुल गया हो… धर्म, दर्शन और उल्लास एक साथ डुबकी लगाते हुए दिखाई देते हैं। अवध की आत्मीयता होली को आलिंगन देती है, बुंदेलखंड की बुलंदी उसे ओज का ओढ़ना पहनाती है और जब बात गोरखपुर की आती है, तब होली में आध्यात्मिक आभा का नया रंग घुल जाता है।

गुरु गोरखनाथ की तपःभूमि पर उड़ता हर गुलाल साधना की सुगंध लिए होता है। भक्त प्रह्लाद की शोभा यात्राएं श्रद्धा के रंग बिखेरती हैं, भगवान नरसिंह की स्मृति साहस का सिन्दूर रचती है। यहां होली केवल हर्ष नहीं, यह धर्म और दृढ़ता का रंगमय उत्सव है। यहां होली हुलास नहीं, हृदय का हवन है। यहां रंग रंजन नहीं, राष्ट्रभाव का रसायन है।

और इसी रंग-राग के बीच होली हमें एक गहरा सत्य भी सिखाती है कि होली केवल रंगों का खेल नहीं, रिश्तों का संदेश है। गुलाल के कण हमें गूढ़ सत्य बताते हैं कि अलग रहें तो धूल हैं, मिल जाएं तो महोत्सव हैं। दीप अलग-अलग टिमटिमाएं तो सीमित प्रकाश देते हैं, साथ जलें तो दीपमालिका बन जाते हैं।

समाज भी ऐसा ही है। यदि हम जाति, क्षेत्र, संकीर्णता और स्वार्थ में बंटेंगे, तो कमजोर होंगे, कटेंगे, क्षीण होंगे। पर यदि हम एकता के केसरिया रंग में रंगे रहेंगे, तो अडिग रहेंगे, अजेय रहेंगे। इसलिए होली की हुंकार स्पष्ट है कि ‘बंटोगे तो कटोगे, संग रहोगे तो सशक्त रहोगे।’ यह चेतावनी नहीं, चेतना है। यह नारा नहीं, नियति का निष्कर्ष है। इंद्रधनुष का सौंदर्य उसके सातों रंगों के संगम में है। समाज की शक्ति उसके समन्वय में है। विविधता यहां विभाजन नहीं, विभूति है।

जब यह रंगमय चेतना समाज में स्थिर होती है, तब उसका प्रतिफल व्यवस्था में भी दिखाई देता है। इस रंगमय परिवेश में आज का उत्तर प्रदेश सुरक्षा और सुशासन के सुरम्य रंगों से भी सजा है। जब भय का धूसर धुंआ छंटता है और भरोसे का हरित-हास फैलता है, तब होली का लाल और अधिक उज्ज्वल दिखता है। जब व्यवस्था सजग होती है, तब उत्सव निर्भय होता है। योगी जी के नेतृत्व की दृढ़ता ने अपराध के अंधकार को रंगहीन कर दिया है और प्रदेश को विश्वास के वसंत से भर दिया है। अब रंगों की बौछार में बेफिक्री की बयार भी बहती है। ऐसे सुरक्षित परिवेश में होली का हर रंग और अधिक अर्थवान हो उठता है क्योंकि जहां कानून का शासन हो, वहीं समाज समरस होता है।

बुंदेलखंड का बुलंद विश्वास, अवध की आत्मीयता, ब्रज का बसंत, काशी का काव्य और गोरखपुर की गौरवगाथा सब मिलकर उत्तर प्रदेश की होली को बहुरंगी, बहुरस और बहुआयामी बनाते हैं।

होलिका दहन की ज्वाला यहां केवल लकड़ी नहीं जलाती, वह भीतर के कलुष को भी राख करती है। लपटों में जैसे अहंकार का धुंआ उड़ता है और आस्था की आभा चमक उठती है। अगली सुबह जब सूरज सुनहरी चूनर ओढ़कर धरा पर उतरता है, तब रंगों की रास आरंभ होती है। लाल पराक्रम है, पीला प्रतिष्ठा है, हरा उम्मीद है, नीला नील गगन-सा विस्तार है। हर रंग रिश्तों का राग है। गांव की गली में बच्चों की किलकारी गुलाबी हो उठती है। चौपाल की हंसी हरित हो जाती है। किसान के कपोल पर पसीना भी सुनहरा लगता है, मानो परिश्रम ने स्वयं रंग धारण कर लिया हो। नगर की सड़कें, मंदिरों की सीढ़ियां, आंगनों की अटारियांं सब रंगों की रजत-रेखा से सज जाती हैं।

आज समरसता का रंग सहकार के पानी में घुलकर समावेश की पिचकारी से सद्भावना की वर्षा कर रहा है। मतभेद भी मधुर हो जाते हैं, मनभेद मिट जाते हैं। विविधता यहां वैभव बनती है। अलग-अलग रंग मिलकर इंद्रधनुष रचते हैं और इंद्रधनुष कभी विभाजित नहीं होता।

आइए, इस होली पर हम केवल गुलाल न उड़ाएं, हम गौरव जगाएं। केवल रंग न लगाएं, रिश्तों को रंगे। केवल हंसी न बांटे हृदय बांटे। होलिका की अग्नि में अहंकार को अर्पित करें और प्रेम का केसर अंतस में सजाएं।

उत्तर प्रदेश की यह होली रंगों का राग है, माधुर्य का मंत्र है, मेल-मिलाप का महायज्ञ है। यहां हर रंग में रिश्तों की रेशमी रेखा है, हर हंसी में हृदय का हार है, हर अबीर में आत्मीयता की आभा है।

आइए, होली केवल खेली न जाए… इसे जी ली जाए। केवल मनाई न जाए…मन में बसाई जाए।

रंगों से रचा, रिश्तों से सजा, राष्ट्र से रंजित, यह प्रदेश आज कह रहा है कि रंगों में रमिए, रागों में रचिए और एकता के इंद्रधनुष में सजे रहिए। आप सभी को रंगमय, रसमय और रूहानी होली की हार्दिक बधाई !

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