सनातन जीवन-संस्कृति में अपनी कहानी तलाशता हिंदी सिनेमा

Picture of प्रणय विक्रम सिंह

प्रणय विक्रम सिंह

@SamacharBhaarti

कहानी शायद वहीं लौट रही है, जहां से भारतीय सिनेमा ने अपनी यात्रा शुरू की थी।

वर्ष 1913 में दादा साहेब फाल्के ने जब राजा हरिश्चंद्र बनाई थी, तब भारतीय सिनेमा के पास न हजारों करोड़ का बजट था, न वीएफएक्स की चकाचौंध और न सितारों का बाजार। उसके पास एक कहानी थी, जिसे यह देश पहले से जानता था। एक चरित्र था, जिसे लोक अपने भीतर जीता था। सत्य था, त्याग था और अपनी सभ्यता से निकला हुआ एक नैतिक द्वंद्व था।

एक सदी से अधिक समय बाद पर्दा बदल चुका है, तकनीक बदल चुकी है, दर्शक बदल चुके हैं लेकिन शायद भारतीय मन की वह मूल धड़कन उतनी नहीं बदली।

2026 की छोटी-सी फिल्म हनुमान अंश ने इसी धड़कन को फिर सुनाई देने लायक बना दिया है।

नीम करौरी बाबा के जीवन और हनुमान भक्ति से प्रेरित हनुमान अंश लगभग ₹1.8 करोड़ के बजट में बनी। शुरुआत इतनी छोटी थी कि पहले दिन की कमाई करीब ₹10 लाख बताई गई। न कोई स्थापित सुपरस्टार, न हजारों स्क्रीन की शुरुआती ताकत। लेकिन दर्शकों की चर्चा ने फिल्म को उठाया और 45वें दिन तक उसका वैश्विक कारोबार लगभग ₹350 करोड़ के आसपास पहुंचने की खबरें आईं।

इस आंकड़े को केवल बॉक्स ऑफिस की सनसनी मान लेना शायद इस कहानी का सबसे छोटा अर्थ होगा।

बड़ा अर्थ कहीं और है।

आखिर ऐसा क्या था कि करोड़ों के प्रचार और बड़े सितारों के बिना एक साधारण सी दिखने वाली आध्यात्मिक कथा ने दर्शक को सिनेमाघर तक खींच लिया?

उत्तर शायद सिनेमा की तकनीक में कम और भारतीय समाज की सांस्कृतिक स्मृति में अधिक छिपा है।

भक्ति को देखा भर नहीं जाता, उसे अनुभव किया जाता है। आस्था किसी ग्राफिक्स इंजन में पैदा नहीं होती। संस्कृति कोई सेट नहीं है, जिसे करोड़ों रुपए खर्च कर खड़ा कर दिया जाए। दर्शन कोई संवाद भी नहीं, जिसे किसी बड़े अभिनेता से बुलवा देने भर से वह दर्शक के भीतर उतर जाए।

तकनीक आंख को चमत्कृत कर सकती है, भाव ही हृदय को छूता है और आस्था की कथा में यह अंतर बहुत बड़ा हो जाता है।

यही कारण है कि भारतीय धार्मिक-सांस्कृतिक आख्यानों को पर्दे पर उतारना किसी सामान्य फैंटेसी कथा को फिल्माने जैसा नहीं है।

राम को दिखाना और रामत्व को अनुभूत करा देना दो अलग क्षमताएं हैं। हनुमान जी का विराट स्वरूप रच देना और उनकी भक्ति का समर्पण दर्शक तक पहुंचा देना दो अलग उपलब्धियां हैं।

दर्शक यहां केवल कहानी देखने नहीं आता। वह अपने साथ अपनी दादी की सुनाई कथा, घर की आरती, गांव की रामलीला, मंदिर की घंटी, मानस की चौपाई और पीढ़ियों की स्मृति भी लेकर आता है।

इसलिए वह पर्दे पर केवल पात्र नहीं देख रहा होता, वह अपनी स्मृति से पर्दे का मिलान भी कर रहा होता है।

शायद रामानंद सागर की रामायण की स्थायी लोकप्रियता का एक सूत्र यहां भी खोजा जा सकता है। सीमित तकनीक के बावजूद उस प्रस्तुति ने कई पीढ़ियों के दर्शकों के मन में स्थान बनाया। तकनीकी दृष्टि से आज उससे कहीं अधिक विराट दृश्य बनाए जा सकते हैं, लेकिन सांस्कृतिक आख्यानों में तकनीकी श्रेष्ठता और भावात्मक स्वीकार्यता हमेशा एक ही चीज नहीं होती।

यहीं से आज के हिंदी सिनेमा के सामने एक रोचक मोड़ दिखाई देता है।

लंबे समय तक मुख्यधारा के हिंदी सिनेमा का बड़ा हिस्सा महानगरीय जीवन, रोमांस, अपराध, ग्लैमर और स्टार-केंद्रित कथाओं के इर्द-गिर्द घूमता रहा। इसका अर्थ यह नहीं कि इस दौरान संस्कृति, इतिहास, सेना, गांव या भारतीय समाज की कहानियां बनी ही नहीं। बनीं और कई सफल भी हुईं। इसलिए पूरे हिंदी सिनेमा को किसी एक रंग में रंग देना इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा।

लेकिन यह भी सच है कि पिछले कुछ वर्षों में भारतीय लोक, पुराण, क्षेत्रीय स्मृतियों और आध्यात्मिक प्रतीकों से निकली कहानियों के लिए बाजार की संभावनाएं अधिक स्पष्ट होकर सामने आई हैं।

दक्षिण भारतीय सिनेमा ने इस दिशा में कुछ उल्लेखनीय उदाहरण दिए। कांतारा ने कर्नाटक की भूत-कोला परंपरा और स्थानीय लोकविश्वास को कथा की आत्मा बनाया। बाहुबली किसी धार्मिक आख्यान का प्रत्यक्ष रूपांतरण नहीं थी, लेकिन उसकी दृश्य-भाषा, राजधर्म, मातृत्व, वचन और महाकाव्यात्मक संरचना भारतीय सांस्कृतिक स्मृति से संवाद करती थी।

इन फिल्मों ने एक महत्वपूर्ण बात समझाई कि ‘लोकल होना ग्लोबल होने की बाधा नहीं है’। अपनी मिट्टी में जड़ें जितनी गहरी हों, कहानी का वृक्ष उतना ही दूर तक फैल सकता है।

अब हिंदी सिनेमा भी जैसे उसी मिट्टी में फिर हाथ डाल रहा है।

हनुमान अंश के बाद 25 सितंबर को द वन: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट सिनेमाघरों में आने वाली है। सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया अभिनीत, दीपक कुमार मिश्रा निर्देशित और एकता कपूर, अरुणाभ कुमार सहित अन्य निर्माताओं की यह फिल्म बिहार के बिहटा क्षेत्र के वन देवी मंदिर से जुड़ी सदियों पुरानी स्थानीय मान्यताओं और लोककथाओं से प्रेरणा लेती है।

यानी कहानी मुंबई के किसी आलीशान अपार्टमेंट से नहीं निकली। वह बिहार के एक जंगल, एक ग्राम-देवी और पीढ़ियों से फुसफुसाती चली आ रही लोककथा से निकली है।

यही बदलाव बहुत दिलचस्प है।

जिस लोक को कभी मुख्यधारा का सिनेमा ‘बहुत स्थानीय’ समझ सकता था, वही लोक अब कथा की विशिष्टता बन रहा है। बिहार की वन देवी हों, कर्नाटक की लोक-परंपराएं हों या उत्तर भारत की संत-भक्ति… सिनेमा धीरे-धीरे उस भारत को खोज रहा है जो महानगरों के बाहर सदियों से अपनी कहानियां स्वयं जीता आया है।

द वन सफल होगी या नहीं, यह 25 सितंबर के बाद दर्शक तय करेंगे। रिलीज से पहले उसके लिए किसी रिकॉर्ड की भविष्यवाणी करना जल्दबाजी होगी। लेकिन उसका विषय चुन लिया जाना अपने आप में इस बदलती सिनेमाई रुचि का संकेत अवश्य है।

और फिर सामने है सबसे बड़ी परीक्षा-रामायण।

नितेश तिवारी की दो भागों में बन रही रामायण का पहला भाग इस दीपावली पर प्रदर्शित होना है। रणबीर कपूर राम, साई पल्लवी सीता और यश रावण की भूमिका में हैं। निर्माता-अभिनेता यश ने स्पष्ट किया है कि चर्चित ₹4,000 करोड़ की राशि किसी एक फिल्म की लागत नहीं, बल्कि दोनों भागों तथा उनके वैश्विक रिलीज और प्रचार सहित पूरे प्रोजेक्ट से जुड़ी है।

पैमाना असाधारण है। तकनीकी महत्वाकांक्षा असाधारण है। ए.आर. रहमान और हांस जिमर जैसे नाम इससे जुड़े हैं।

लेकिन रामायण की असली चुनौती ₹4,000 करोड़ नहीं है। उसकी असली चुनौती राम और सीता को केवल पर्दे पर उतारना नहीं, भारतीय मानस में बसे उनके भाव को पर्दे पर जीवंत कर देना है।

क्योंकि राम भारतीय मानस में मनुष्यता के महानायक भर नहीं हैं। वे पुत्र हैं, पति हैं, भाई हैं, वनवासी हैं, राजा हैं, वे संघर्ष में धैर्य, सामर्थ्य में संयम और संबंधों में मर्यादा की भारतीय जीवन-दृष्टि के सर्वोच्च प्रतिमान हैं। उसी तरह सीता केवल मर्यादा पुरुषोत्तम की सहधर्मिणी नहीं हैं। वे धैर्य में दृढ़ता, मर्यादा में महिमा, स्वाभिमान में शक्ति और त्याग में तपस्या की वह जीवंत प्रतिमा हैं, जिसमें भारतीय स्त्री-चेतना सहस्राब्दियों से स्वयं को देखती आई है।

वाल्मीकि की रामायण से तुलसी के रामचरितमानस और लोक की असंख्य रामकथाओं तक आते-आते यह आख्यान पुस्तक से बहुत आगे निकल चुका है।

वह लोकगीत में है।
वह रामलीला में है।
वह विवाह के मंगल में है।
वह वनवासी समाज की कथाओं में है।

वह गांव के छोटे मंदिर में है और महानगर के घर की पूजा-चौकी में भी।

इसीलिए रामायण को फिल्माना केवल एक महाकाव्य का ‘स्क्रीन अडैप्टेशन’ नहीं है। यह करोड़ों लोगों की सांस्कृतिक स्मृति से संवाद है।

यहां वीएफएक्स आवश्यक हो सकता है, लेकिन पर्याप्त नहीं।

भव्य लंका बनाई जा सकती है। समुद्र पर सेतु रचा जा सकता है। आकाश में युद्ध दिखाया जा सकता है। हजारों वानरों की सेना कंप्यूटर पर खड़ी की जा सकती है।

लेकिन राम की आंखों में करुणा, सीता के मौन में स्वाभिमान, भरत के त्याग में तप और हनुमान के समर्पण में भक्ति… इनका कोई सॉफ्टवेयर नहीं होता।

इन्हें कलाकार को जीना पड़ता है। लेखक को समझना पड़ता है। निर्देशक को अनुभव करना पड़ता है। संगीतकार को सुनना पड़ता है।

और दर्शक?

वह तुरंत पहचान लेता है कि पर्दे पर केवल अभिनय हो रहा है या कहीं भीतर कोई भाव भी बह रहा है।

हनुमान अंश की सफलता को इसलिए बड़े बजट के विरुद्ध छोटे बजट की जीत कहना भी अधूरा होगा। उसका अधिक महत्वपूर्ण संदेश यह है कि दर्शक तक पहुंचने का सबसे छोटा रास्ता हमेशा सबसे महंगा रास्ता नहीं होता।

कभी-कभी वह रास्ता उसकी अपनी स्मृतियों से होकर जाता है।

उसकी भाषा से।
उसके लोक से।
उसकी आस्था से।
उसकी मिट्टी से।
और संभवतः भारतीय सिनेमा के लिए यही इस समय की सबसे बड़ी सीख है।

सनातन जीवन-संस्कृति कहानियों की कोई छोटी-सी खान नहीं है, जिसमें से दो-चार पौराणिक पात्र निकालकर फ्रेंचाइजी बना दी जाए। यह हजारों वर्षों से बहती हुई वह विराट कथा-परंपरा है जिसमें राम और कृष्ण हैं तो कबीर और तुलसी भी। शिव और शक्ति हैं तो ग्राम-देवियां और लोकदेवता भी। वेदांत है तो लोकगीत भी। दर्शन है तो पर्व भी। तीर्थ हैं तो जंगल, नदी, पहाड़ और गांव से जुड़ी असंख्य स्मृतियां भी।

यहां कथाओं की कमी नहीं है। जरूरत उन्हें देखने वाली आंख और महसूस करने वाले हृदय की है।

इसलिए हिंदी सिनेमा का अपनी जड़ों की ओर लौटना स्वागत योग्य सांस्कृतिक संभावना है, बशर्ते वह आस्था को केवल ‘मार्केट सेगमेंट’ न समझ बैठे।

क्योंकि आस्था बिकाऊ विषय बनते ही कृत्रिम दिखाई देने लगती है।

उसे सम्मान चाहिए।
अध्ययन चाहिए।
संवेदना चाहिए।
और सबसे अधिक …भाव चाहिए।

सौ वर्ष पहले राजा हरिश्चंद्र के पास तकनीक नहीं थी, लेकिन अपनी कथा पर विश्वास था। आज भारतीय सिनेमा के पास संसार की श्रेष्ठ तकनीक तक पहुंच है। यदि उस तकनीक के साथ अपनी सभ्यता की समझ और लोक के प्रति वही विश्वास जुड़ जाए, तो भारतीय कथाओं को संसार तक पहुंचने के लिए किसी उधार की सांस्कृतिक भाषा की आवश्यकता नहीं है।

शायद चक्र पूरा हो रहा है।

सिनेमा आधुनिक होता गया, बाजार वैश्विक होता गया, पर्दा विराट होता गया और इतनी लंबी यात्रा के बाद उसे फिर अपनी ही मिट्टी में कहानी दिखाई देने लगी है।

क्योंकि भारत में कहानी केवल लिखी नहीं जाती। कहीं वह गाई जाती है, कहीं पूजी जाती है, कहीं पीढ़ियों से सुनाई जाती है और कहीं वह जीवन की तरह जी जाती है।

हिंदी सिनेमा यदि इस अंतर को समझ गया, तो उसे केवल नई कहानियां नहीं मिलेंगी। उसे अपनी खोई हुई धड़कन भी मिल सकती है।

Share this post:

READ MORE NEWS...

LIVE CRICKET SCORE

CORONA UPDATE

Weather Data Source: Wetter Indien 7 tage

RASHIFAL

2024 Reserved Samachar Bhaarti | Designed by Best News Portal Development Company - Traffic Tail